अध्याय 1
जीव जगत
जीवों के विस्तृत प्रकारों की शृंखला आश्चर्यचकित करनेवाली है ।
चाहे ठंडे पर्वत ,पर्णपाती वन, महासागर , अलवणीय (मीठा) जलीय झीलें, मरुस्थल (गरम झरनों ) हरेक जगह जीव का वास है।
1.1 जीव क्या है ?
जीव :- वृद्धि ,जनन,पर्यावरण के प्रति संवेदना लगाना तथा इसके अनुकूल क्रिया करना । ये जीव के मुख्य लक्षण है।
-उपापचय, स्वयं की प्रतिलिपि बनाना, स्वयं को संगठित करना ,प्रतिक्रिया करना तथा उदगम आदि । ये भी जीव के लक्षण हैं.
सभी जीव वृद्धि करते हैं ।
जीवों के भार तथा संख्या में वृद्धि होना , ये दोनों वृद्धि के द्वयुग्मी अभिलक्षण हैं ।
बहुकोशिकीय जीव कोशिका विभाजन द्वारा वृद्धि करते हैं ।
पौधों में यह वृद्धि जीवनपर्यन्त कोशिका विभाजन द्वारा सम्पन्न होती है।
लेकिन प्राणियों में यह वृद्धि कुछ आयु तक होती है ।
लेकिन कोशिका विभाजन विशिष्ट उत्तकों में होता है । ताकि विलुप्त कोशिकाओं के स्थान पर नई कोशिकाएं आ सके ।
एक कोशिकीय जीव भी कोशिका विभाजन द्वारा वृद्धि करते हैं।
जीव के भार में वृद्धि होने को भी वृद्धि समझा जाता है । यदि हम भार को वृद्धि का अभिलक्षण मानते हैं तो निर्जीवों के भार में भी वृद्धि हो सकती है ।
पर्वत गोलश्मक तथा रेत के टीले भी वृद्धि करते हैं ।
लेकिन निर्जीवों में इस प्रकार की वृद्धि उनकी साथ पर पदार्थों के एकत्र होने के कारण होती हैं ।
जीवों में यह वृद्धि अंदर की ओर से होती है ।
इसलिए वृद्धि को जीवों का एक विशिष्ट गुण नहीं मान सकते हैं ।
जनन जीवों का अभिलक्षण है ।
बहुकोशिकीय जीवों में जनन का अर्थ अपनी संतति उतपन्न करना है जिसके अभिलक्षण उसे अपने माता-पिता से मिलते हैं।
जीव लैंगिक और अलैंगिक जनन दोनों करते हैं।
कुछ जीव जनन नहीं करते हैं (खेसर या खच्चर, बंध्य कामगार मधुमक्खी, अनुर्वर मानव युगल आदि ) ।
इस प्रकार जनन भी जीवों का समग्र विशिष्ट लक्षण नहीं हो सकता यद्यपि ,कोई भी निर्जीव वस्तु जनन अथवा अपनी प्रतिलिपि बनाने में अक्षम है ।
जीवों का दूसरा लक्षण उपापचयन है ।
सभी जीव रसायनों से बने होते हैं ।
रसायन छोटे ,बड़े विभिन्न वर्ग, माप ,क्रिया आदि वाले होते हैं जो अनवरत जैव अणुओं में बदलते और उनका निर्माण करते हैं ।
ये परिवर्तन रासायनिक अथवा उपापचयी क्रिया हैं ।
सभी जीवों ,चाहें वे बहुकोशिकीय हो अथवा एककोशिकीय हों , में हजारों उपापचयी क्रिया साथ-साथ चलती रहती हैं ।
पर्यावरण के प्रति सवेदनशील
अपने संवेदी अंगों द्वारा अपने पर्यावरण से अवगत होते हैं ।
पौधे प्रकाश ,पानी, ताप, अन्य जीवों, प्रदूषकों आदि जैसे बाह्य कारकों के प्रति प्रतिक्रिया दिखाते हैं ।
1.2 जीव जगत में विविधता
अगर आप अपने आसपास देखेंगे तो पता चलेगा कि जीवों का बहुत किस्में हैं ।
बहुत ऐसे जीव भी होते हैं जो आखों की सहायता से नहीं दिखाई देता है , लेकिन ये आपके आसपास ही होते हैं ।
अगर सघन वन में जाएं तो पता चलेगा कि बहुत किस्मों की पौधों भी हैं तथा जंतु भी । ये थोड़ा आश्चर्य जरूर करता है ।
अभी तक ज्ञात तथा वर्णित स्पीशीज की संख्या लगभग 1.7 मिलियन से लेकर 1.8 मिलियन तक हो सकती है । इसे हम जैविक विविधता कहते हैं।
बहुत ऐसे जीव है जिसे हम उसे अपने स्थानीय नाम से जानते हैं । थोड़ा सोचिए अगर हमारे पास एक कोई मानक नहीं हो तो हमें भ्रम पैदा होती रहेगी ।
एक जीव जिसका नाम एक स्थान पर कुछ ओर दूसरे स्थान पर कुछ ओर ही हो । इसलिए वैज्ञानिकों ने सोच समझकर नाम-पद्धति की शुरुआत की ।
एक मानक तय होता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए और पहले से खोज किये गए जीवों का नामकरण होता है, जिसे दुनिया में सभी लोग सिर्फ एक ही नाम से उस जीव को जानते हैं । ये नाम वैज्ञानिक नाम होते हैं ।
वैज्ञानिक नाम का प्रयोग थोड़ा जटिल होता है इसलिए इसे वैज्ञानिकों द्वारा ही प्रयोग किया जाता है । आमलोग उसे अपने स्थानीय नाम से ही जानते हैं ।
वनस्पति (पादप , पौधा ) के वैज्ञानिक नाम रखने के लिए विश्व स्तर पर एक संस्था है इंटरनेशनल कोड ऑफ बोटेनिकल नोमेनकलेचर (ICBM) ये संस्था पौधों का वैज्ञानिक नाम रखती है ।
वही प्राणिविदों ने इंटरनेशनल कोड ऑफ जयोलॉजिकल नोमेनकलेचर (ICZM) बनाया ये संस्था जंतु का वैज्ञानिक नाम रखती है ।
बहुत ऐसे जीव है जिसे हम उसे अपने स्थानीय नाम से जानते हैं । थोड़ा सोचिए अगर हमारे पास एक कोई मानक नहीं हो तो हमें भ्रम पैदा होती रहेगी । एक जीव जिसका नाम एक स्थान पर कुछ ओर दूसरे स्थान पर कुछ ओर ही हो । इसलिए वैज्ञानिकों ने सोच समझकर नाम-पद्धति की शुरुआत की । एक मानक तय होता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए और पहले से खोज किये गए जीवों का नामकरण होता है, जिसे दुनिया में सभी लोग सिर्फ एक ही नाम से उस जीव को जानते हैं । ये नाम वैज्ञानिक नाम होते हैं । वैज्ञानिक नाम का प्रयोग थोड़ा जटिल होता है इसलिए इसे वैज्ञानिकों द्वारा ही प्रयोग किया जाता है । आमलोग उसे अपने स्थानीय नाम से ही जानते हैं ।
वनस्पति (पादप , पौधा ) के वैज्ञानिक नाम रखने के लिए विश्व स्तर पर एक संस्था है इंटरनेशनल कोड ऑफ बोटेनिकल नोमेनकलेचर (ICBM) ये संस्था पौधों का वैज्ञानिक नाम रखती है ।
वही प्राणिविदों ने इंटरनेशनल कोड ऑफ जयोलॉजिकल नोमेनकलेचर (ICZM) बनाया ये संस्था जंतु का वैज्ञानिक नाम रखती है ।
जीव विज्ञानी ज्ञात जीवों के वैज्ञानिक नाम देने के लिए एक नियम का पालन करती है ।
प्रत्येक नाम के दो घटक होते हैं ।
वंशनाम
जाति संकेत पद
इस तरह के नाम रखने का नियम "द्विपदनाम पद्धति" कहलाता है ।
-इस तरह से नाम रखने का नियम "कैरोलस लीनियस " ने सुझाया था ।
-यह नामपद्धति बहुत ही सुविधाजनक है, इसका उपयोग विश्व के सभी जीव विज्ञानी करते हैं ।
जैसे :- आम का वैज्ञानिक नाम "मैनजीफेरा इंडिका " है ।
यहाँ मैनजीफेरा वंशनाम है ।
और इंडिका जाति का संकेत है ।
जैविक नाम प्रायः लैटिन भाषा में होते हैं जो तिरछे लिखे जाते हैं । ये मायने नहीं रखता है कि उस जीव का उद्भव कहाँ हुआ हो ।
इस नाम में पहला शब्द वंशनाम होता है । और दूसरा शब्द जाति संकेत पद है ।
जब इस नाम को लिखा जाता है तो उसे तिरछा कर के लिखा जाता है जैसे मैनजीफेरा इंडिका ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये शब्द लैटिन भाषा के उद्भव को दिखाता है । लैटिन में तिरछा शब्द लिखा जाता है ।
वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द वंशनाम होता है । दूसरा शब्द जाति के संकेत देता है । जैसे मैनजीफेरा इंडिका में मैनजीफेरा वंशनाम है वहीं इंडिका जाति का संकेत देता है ।
अब जाति संकेत के बाद अंत में लेखक का नाम लिखा जाता है । इसे संक्षेप में लिखा जाता है ।
जैसे :- मैनजीफेरा इंडिका (लिन ) . इसका मतलब यह होता है कि सबसे पहले इस जाति का वर्णन लीनियस ने किया था ।
सभी जीवों का अध्ययन करना लगभग असंभव है इसलिए जीवों का वर्गीकरण किया जाने लगा ।
वर्गीकरण का मतलब यह होता है कि अगर दो जीव का कुछ खास गुण एक है तो उनके एक ही वर्ग में रखा जाता है । उस वर्ग का नाम भी होता है ।
जैसे "स्तनधारी " एक वर्ग है । स्तनधारी का मतलब यह होता है कि जो जीव अंडा नहीं देता है । जो सीधे बच्चे को जन्म देता है उसे स्तनधारी कहा जाता है ।
अब इस वर्ग में उस जीव को रखा जाएगा जो सिर्फ बच्चे को जन्म देता है ।
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