socialogy for upsc option in Hindi | यूरोप में आधुनिकता और सामाजिक परिवर्तन तथा समाजशास्त्र आविर्भाव

यूरोप में आधुनिकता और सामाजिक परिवर्तन तथा समाजशास्त्र आविर्भाव


for UPSC optional
 Hindi medium students
 
यूरोप का स्वरूप (आधुनिकता से पहले )

प्राचीन यूरोप का स्वरूप परम्परावादी था। उसकी आर्थिक व्यवस्था में भूमि को केन्द्रीय स्थान प्राप्त था। 

सामंत भूमि के मालिक थे तथा किसान भूमि पर काम करते थे। समाज दो वर्गों में बंटा था और उनका विभाजन एकदम शीशे की तरह साफ था। धर्म,समाज का आधारभूत सिद्धांत था। धर्मगुरु, जैसे पादरी, ही यह तय करते थे कि क्या नैतिक है और क्या नहीं। परिवार तथा नातेदारी संबंधों का मानव-जीवन में अति महत्वपूर्ण स्थान था। राजतंत्र की जड़े समाज में बहुत गहरी जमी हुई थीं। ऐसी मान्यता थी कि ईश्वर ने राजा को लोगों पर शासन करने के लिए भेजा है ।


फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप जो नया यूरोप उभरकर सामने आया, उसने प्राचीन यूरोप के हर मुख्य पहलू को चुनौती दी। 

फलस्वरूप वर्गों का पुनर्गठन हुआ। पुराने वर्ग ध्वस्त हो गए तथा नए वर्गों ने जन्म लिया। धर्म को चुनौती दी जाने लगी। धर्म का महत्व पहले से कम हो गया । 

पारिवारिक निष्ठाओं का स्थान वैचारिक आस्थाओं ने ले लिया। महिलाओं की स्थिति में बदलाव आया। 

अंतत: राजतंत्र की समाप्ति हुई और लोकतंत्र का आगमन हुआ। समाज की सभी मुख्य धारणाओं - धर्म, समुदाय, सत्ता, सम्पत्ति आदि की नई व्याख्याएं होने लगी और उन्हें नए संदर्भ मिलने लगे। 

वर्तमान तथा अतीत के बीच अंतर भी साफ हो गया। कुलीन वर्ग के लोगों के लिए वर्तमान भयावह हो गया क्योंकि उनके जान-माल के लिए खतरे पैदा हो गए थे जबकि किसानों के लिए वर्तमान अत्यंत सुखद था, क्योंकि उन्हें नए अवसर तथा नई शक्ति की प्राप्ति हो रही थी।

प्रबोधन युग (Enlightenment Period)

यूरोपीय इतिहास का वह काल, जिसमें फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति के रूप में इतने व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन हुए।

 यूरोपीय समाज में परिवर्तन का यह दौर प्रबोधन युग (Enlightenment Period) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसमें अट्ठारहवीं शताब्दी के फ्रांसीसी दार्शनिकों की चेतना निश्चित रूप से व्यक्त हुई है। 

प्रबोधन युग में सामंतवादी यूरोप के परम्परागत चिन्तन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। इससे यथार्थ की नई दृष्टि और उसके चिंतन के नए तरीके ने जन्म लिया। 

 लोग जीवन के हर पहलू पर तार्किक चिन्तन करने लगे तथा इस समय धर्म, सरकार या राजा की कही बात को अंतिम सत्य मानने की प्रवृत्ति समाप्त होने लगी। 

यह विश्वास किया गया कि प्रकृति तथा समाज, दोनों का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जा सकता है। मनुष्य अनिवार्यतः तार्किक प्राणी है। 

तर्कपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित समाज मनुष्य को अपनी अनंत क्षमताओं को पहचानने में अधिक सहायक सिद्ध होता है। ऐसे विचारों की जड़े यूरोप में विज्ञान तथा वाणिज्य के विकास में ही निहित थीं। 

वाणिज्यिक क्रांति तथा वैज्ञानिक क्रांति के फलस्वरूप एक नया दृष्टिकोण पनपा तथा यह फ्रांसीसी तथा औद्योगिक क्रांतियों के दौरान पुष्ट हुआ। 

इस नए दृष्टिकोण से समाजशास्त्र की नींव पड़ी।

फ्रांसीसी क्रांति

1789 में हुई फ्रांसीसी क्रांति स्वतंत्रता तथा समानता के लिए मानव संघर्ष के इतिहास को नया मोड़ देने वाली घटना सिद्ध हुई। 

इस क्रांति ने सामंतवाद के युग को समाप्त करके नई समाज व्यवस्था का सूत्रपात किया। 

इस क्रांति से केवल फ्रांसीसी समाज में ही नहीं बल्कि समूचे यूरोपीय समाज में दूरगामी परिवर्तन हुए। और तो और, अन्य महाद्वीपों के देश जैसे भारत भी इस क्रांति से उपजे विचारों से अछूते नहीं रहे। 

स्वतंत्रता, भ्रातृत्व तथा समानता जैसे विचार, जो अब हमारे संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित हैं, फ्रांसीसी क्रांति की ही देन हैं।


फ्रांसीसी समाज का बुनियादी स्वरूप

फ्रांसीसी समाज सामंतवादी संपत्ति समूहों (एस्टेटों) में बंटा हुआ था। 

सामंतवादी फ्रांसीसी समाज के तीन एस्टेट थे। सामंतवादी यूरोपीय समाजों में "एस्टेट” संस्तरण की एक प्रणाली है, जिसके आधार पर एक वर्ग या एस्टेट को दूसरे वर्गों से स्तर, अधिकार, प्रतिबंधों आदि की

 ) प्रथम सम्पत्ति समूह या एस्टेटः इसमें धर्म नेता शामिल थे और यह समूह भी आगे विभिन्न स्तरों में विभाजित था, जिन्हें कार्डिनल, आर्क बिशप, बिशप, ऐबट आदि कहा जाता था।

बहुत वैभवपूर्ण जीवन बिताते थे और वास्तव में धर्म की ओर बहुत कम ध्यान देते थे। उनमें कुछ लोगों को धार्मिक जीवन की बजाय राजनीतिक जीवन अधिक पसंद था। 

उनका अधिकतर समय मद्यपान, जूआ आदि विलासितापूर्ण गतिविधियों में बीतता था। उच्च धर्मनेताओं की तुलना में छोटे स्तर के पादरियों को अधिक काम करना पड़ता था तथा निर्धनता की मार भी झेलनी पड़ती थी।

 ) दूसरा सम्पत्ति समूह या एस्टेट: इस वर्ग में 'नोबल' थे। नोबल की दो श्रेणियां थी। पहली श्रेणी के नोबल शस्त्रों से तथा दूसरी श्रेणी के नोबल वस्त्रों से पहचाने जाते थे। 

पहले श्रेणी के नोबल बड़े-बड़े भूस्वामी थे। वे सिद्धांतिक रूप से जनता के रक्षक थे किंतु वास्तव में वे शोषक थे और सारा काम किसानों से लेते थे। वे बड़ी शान-शौकत की ज़िन्दगी बसर करते थे और फिजूलखर्ची उनकी पहचान थी। 

वे खुद कोई काम नहीं करते थे। उनकी तुलना भारत के सामंती जमीदारों से की जा सकती है। दूसरी श्रेणी के नोबल जन्म से नोबल नहीं थे, बल्कि उन्हें नोबल की पदवी दी जाती थी। 

वे मजिस्ट्रेट तथा न्यायाधीश थे। इनमें से कुछ लोग उदार तथा प्रगतिशील थे, क्योंकि वे आम लोगों के तीसरे सम्पत्ति समूह से ही उन्नति करके इन पदों पर पहुंचे थे।

) तीसरा सम्पत्ति समूह या एस्टेट: समाज के शेष लोग इस तीसरे वर्ग में शामिल थे। इनमें किसान, व्यापारी, कारीगर तथा अन्य लोग थे। 

धर्म नेताओं तथा नोबल वर्ग की तुलना में किसानों की अवस्था बदतर थी। किसान रात-दिन परिश्रम करते थे और उन्हें भारी कर भी देने पड़ते थे, जिससे वे कठिनाई से गुजर-बसर कर पाते थे। 

वे ही पूरे समाज के लिए अन्न उपजाते थे। परंतु सरकार की ओर से कोई संरक्षण होने के कारण उनका जीना दूभर था। 

राजा भी अन्य दो वर्गों अर्थात् धर्मनेता तथा नोबल को खुश करने के लिए इस तीसरे वर्ग का शोषण करता रहता था। किसान उनके सामने एकदम लाचार थे, जबकि धर्मनेता तथा नोबल राजा की जी-हजूरी करते थे। 

किसानों के मुकाबले मध्यम वर्ग की दशा काफी बेहतर थी। बुर्जुआ कहलाने वाले इस वर्ग में व्यापारी, बैंकर, वकील, उत्पादक आदि शामिल थे। ये लोग भी तीसरे समूह में थे। 

1720-1789 के दौरान शासन की निर्धनता के कारण कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई, जिससे इस मध्यम वर्ग को नुकसान की बजाय लाभ हुआ। उन्होंने इस मूल्य वृद्धि का, भरपूर फायदा उठाया। तब तक फ्रांसीसी व्यापार में भी विस्तार होने लगा था, जिसके कारण वाणिज्यिक वर्गों को बहुत लाभ हुआ। 

इस प्रकार यह वर्ग अमीर बन गया। इसके बावजूद पहले तथा दूसरे सम्पत्ति समूह की तुलना में इनकी सामाजिक प्रस्थिति बहुत ही निम्न थी। 

व्यापार, उद्योग, बैंकिंग आदि पर नियंत्रण हो जाने पर भी दरबार यो प्रशासन में बुर्जुआ वर्ग का कोई प्रभाव नहीं था। पहले दोनों सम्पत्ति समूह उन्हें हीन समझते थे और राजा उनकी तरफ ध्यान नहीं देता था। 

इसलिए उनके लिए राजसत्ता हासिल करना आवश्यक हो गया।धर्मनेता तथा नोबल कुल आबादी का केवल दो प्रतिशत थे, किंतु वे लगभग पैंतीस प्रतिशत सम्पत्ति के मालिक थे। 

किसानों की आबादी अस्सी प्रतिशत थी, किंतु उनके पास केवल तीस प्रतिशत सम्पत्ति थी। पहले दो समूह सरकार को कोई कर नहीं देते थे। दूसरी ओर, किसानों पर तरह-तरह के कर लगे हुए थे। 

वे गिरजाघरों और सामंतों को कर देने के साथ-साथ सरकार को भी आय कर, चुंगी कर, भूमि कर आदि देते थे। वे पहले दोनों सम्पत्ति समूहों का बोझ अपने कंधों पर उठाए हुए थे। इन सब हालातों के अतिरिक्त उस काल में कीमतों में भी अत्यधिक वृद्धि हुई। 

1720-1789 के दौरान सभी वस्तुओं की कीमतों से लगभग पैंसठ प्रतिशत बढ़ोतरी हुई थी।

फ्रांसीसी समाज के राजनीतिक पहलू
जैसा कि हर जगह था फ्रांस के राजतंत्र में भी राजा के शासन करने के दैविक अधिकार को मान्यता प्राप्त थी। लगभग दो सौ वर्षों तक फ्रांस पर बोर्बन राजवंश ने शासन किया। 

राजा के शासन में आम लोगों को किसी तरह का व्यक्तिगत अधिकार प्राप्त नहीं था। उनका काम केवल तरह-तरह से राजा तथा नोबल वर्ग की सेवा करना था। राजा का हुक्म ही कानून था और राजा के आदेश पर किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था तथा इसके लिए मुकदमे आदि की कोई जरूरत नहीं होती थी। 

अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग कानून लागू थे, जिससे भ्रम तथा मनमानी का माहौल बना रहता था। राजा की आय और राज्य की आय से एक ही अभिप्राय होता था अर्थात् सरकार की आय ही राजा की आय होती थी।

फ्रांसीसी समाज के आर्थिक पहलू
 लुई-14 के शासन काल से ही फ्रांस के राजाओं ने कई लड़ाइयाँ लड़ी जिनमें काफी धन व्यर्थ हुआ। 1715 में लुई-14 की मृत्यु के समय फ्रांस की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर हो चुकी थी। 

लुई-15 हालत में सुधार लाने की बजाय महाजनों से ऋण लेकर काम चलाने लगा। फ्रांस उस समय कितने गहरे संकट से गुजर रहा था, इसकी व्याख्या लुई-15 के मशहूर कथन मेरे बाद प्रलय” (after me the deluge) से स्पष्ट हो जाती है। 

लुई-16 एकदम कमज़ोर तथा प्रभावहीन राजा था, जिसे फ्रांस की दिवालिया सरकार विरासत में मिली थी। उसकी पत्नी महारानी मारी आन्तोनेत अपनी फिजूलखर्ची के साथ-साथ एक इतिहास प्रसिद्ध वाक्य के लिए भी जानी जाती है। 

यह वाक्य (उत्तर) उसने फ्रांस की भूखी जनता के सामने तब बोला था जब खाना माँगने के लिये जनता महल के बाहर इकट्ठी हुई थी। महारानी ने कहा था "यदि तुम्हारे पास ब्रेड (रोटी) नहीं है तो केक खा लो।"

फ्रांस में बौद्धिक विकास
अट्ठारहवीं शताब्दी में अन्य यूरोपीय देशों की भांति फ्रांस ने भी तर्क और बुद्धिवाद के युग में प्रवेश किया। उस समय के कुछ प्रमुख दार्शनिक तर्कवादी थे, जिनका यह विश्वास था कि सत्य को तर्क के आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है। 

इन दार्शीनकों के विचारों का फ्रांसीसी लोगों पर काफी प्रभाव पड़ा। इनमें से कुछ थे - मांटेस्क्यू (1689-1755), लॉक (1632-1704), वॉल्टेयर (1694-1778) तथा रूसो (1712-1778) 

मांटेस्क्यू ने अपनी पुस्तक, स्पिरिट ऑफ लॉ, में यह विचार व्यक्त किया कि प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक सत्ता का एक स्थान पर केन्द्रीयकरण नहीं होना चाहिए। 

वह अधिकारों के पृथकीकरण के सिद्धांत और व्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में था। ब्रिटिश दार्शनिक लॉक की मान्यता थी कि प्रत्येक व्यक्ति के कुछ अधिकार हैं, जो किसी भी सत्ता द्वारा हथियाए नहीं जा सकते। 

ये अधिकार हैं: जीवन का अधिकार,सम्पत्ति का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार। उसका यह मत था कि जो शामक अपनी जनता को इन अधिकारों से वंचित करे उसे हटा दिया जाना चाहिए और उस स्थान पर ऐसे शासक को सत्ता सौंपी जानी चाहिए, जो इन अधिकारों की रक्षा करने में समर्थ हो। 

फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर ने धार्मिक सहिष्ण। और बोलने की स्वतंत्रता यानी फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का समर्थन किया। वह व्यक्तियों के बोलने तथा अभिव्यक्ति के अधिकारों के भी पक्ष में था। रूसो ने अपनी विख्यात पुस्तक, सोशल कांट्रेक्ट, में लिखा कि किसी देश की जनता को अपना शासक चुनने का अधिकार है। 

उसका विश्वास था कि लोगों के व्यक्तित्व का विकास तभी संभव है, जब उनकी अपनी पसंद की सरकार हो इन तथा अन्य प्रमुख विद्धानों के विचारों ने फ्रांसीसियों की मानसिकता को झकझोर दिया।

इसके अलावा, जो फ्रांसीसी लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ स्वतंत्रता की लड़ाई में अमरीका की सहायता के लिए भेजी गई फ्रांसीसी फौज में शामिल थे, वे अमरीका से समानता तथा अपनी सरकार स्वयं चुनने के अधिकार का विचार लेकर स्वदेश लौटे थे। 

स्वतंत्रता और समानता के इन विचारों ने फ्रांसीसी मध्यम वर्ग को बहुत प्रभवित किया।

महत्वपूर्ण घटनाएं

फ्रांस में 'एस्टेट जनरल' (Estate General) नाम की एक संसदीय संस्था थी जिसमें तीनों सम्पत्ति समूहों के प्रतिनिधि थे। 

किंतु 1614 के बाद उसकी कोई बैठक नहीं हुई थी। 1778 में लुई-16 को मजबूर होकर परिस्थिति में भेद किए बगैर सभी लोगों पर कर लगाने पड़े। 

राजा के विलासितापूर्ण खर्चा तथा अमरीका की स्वतंत्रता की लड़ाई में सहायता देने के फलस्वरूप फ्रांसीसी सरकार दिवालिया हो चुकी थी। 

जब धनी नोबल वर्ग पर भी कर लगाये गए तो उन्होंने एस्टेट जनरल की बैठक की मांग की, क्योंकि उनका विचार था कि कर लगाने का अधिकार केवल एस्टेट जनरल को है। 

5 मई, 1789 को इस संस्था की बैठक हुई किंतु पिछली प्रणाली के विपरीत इस बार तीसरी एस्टेट के प्रतिनिधियों ने मांग की कि सभी सम्पत्ति समूहों के प्रतिनिधि एकत्र होकर एक सभा के सदस्यों के रूप में मतदान करें। किंतु पहले दो सम्पत्ति समूहों के लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। 

एक ही सभा में तीसरी एस्टेट के साथ बैठने से पहली दो एस्टेटों के इन्कार कर देने पर राष्ट्रीय असेम्बली का गठन हुआ। मध्यम वर्ग के नेताओं और कुछ उदार नोबलों के नेतश्त्व में हुई राष्ट्रीय असेम्बली की बैठक का कड़ा विरोध हुआ। 

20 जून, 1789 को जब पेरिस के निकट वसई में निर्धारित बैठक के लिए सदस्य पहुँचे तो हाल पर ताला लगा था और राजा के सैनिक वहां पहरा दे रहे थे। इस पर राष्ट्रीय असेम्बली के सदस्यों ने अपने नेता बेली के नेतृत्व में निकट के एक भवन में, जो कि टेनिस का कोर्ट था, अपनी बैठक की। 

इसी बैठक में उन्होंने फ्रांस के लिए नया संविधान बनाने की शपथ ली। फ्रांसीसी क्रांति के आरम्भ का बिगुल बजाने वाली यह शपथ टेनिस कोर्ट की शपथ (Oath of the Tennis Court) के नाम से विख्यात है।

ii) 14 जुलाई, 1789 को फ्रांसीसी क्रांति की एक अति महत्वपूर्ण घटना घटी। उस दिन एक पुरानी शाही जेल बेस्टाइ पर धावा बोल दिया गया। यह जेल दमन का प्रतीक था मध्यम वर्ग के कुछ नेताओं के नेतृत्व में पेरिसवासियों की भीड़ ने जेल के फाटक खोल दिए और कैदियों को रिहा कर दिया। इस घटना के पीछे दो कारण थे। एक था भोजन की कमी और दूसरा था एक लोकप्रिय मंत्री नेकर की बर्खास्तगी

शासक वर्ग, विशेषकर राजा, के खिलाफ पेरिस की जनता ने बगावत कर दी। फ्रांस में इस दिन को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

iii) संविधान सभा (1789-1791) ने मानव अधिकारों की घोषण की। इस सभा में तीसरी एस्टेट के प्रतिनिधि तथा पहली दो एस्टेटों के उदारवादी सदस्य थे। इस घोषणा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वत्रंता तथा मनमाने दंड से मुक्ति की गारंटी का प्रावधान था। इसमें धर्म नेताओं तथा नोबल वर्ग के विशेष अधिकार समाप्त कर दिए गए। राजा के शासन करने के दैविक अधिकार की अब कोई मान्यता नहीं रही।

कई और महत्वपूर्ण सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन भी किए गए। इस घोषण में कहा गया कि सभी व्यक्ति जन्म से समान है और कानून के सामने भी वे समान रहेंगे। लोगों को अपनी पसंद की सरकार चुनने तथा दमन का विरोध करने का अधिकार है। सभी लोगों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया। इस प्रकार, स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के विचारों को इस घोषण में गौरवान्वित किया गया। स्वतंत्रता और समानता से पुराने सामंतवादी समाज में पाए जाने वाले पैतृक विशेषधिकारों, दासता और तानाशाही के युग का अंत हो गया।

iv) 1791 में राजा ने फ्रांस से भागने का प्रयास किया, किंतु सीमा पर लोगों ने उसे पहचान लिया और वापस लाकर राजा को बंदी बना लिया गया।

 v) पेरिस में नई लेजिस्लेटिव असेम्बली (1791-1792) का गठन किया गया, इसमें गिरोडिन(Girondin) तथा जैकोबिन (Jacobin) नाम के दो महत्वपूर्ण समूह शामिल थे। ये समूह राजा को देशद्रोही मानते थे और गणराज्य की स्थापना के समर्थ थे।

vi) देशद्रोह का अपराधी पाए जाने के बाद 21 जनवरी, 1793 को राजा लुई-16 की रोगों के सामने गिलोटिन यानी सिर काटकर हत्या कर दी गई। बाद में उसी वर्ष महारानी मारी आन्तोनेत को भी मौत के घाट उतार दिया गया। फ्रांस को गणराज्य घोषित कर दिया गया।

vi) फ्रांस में “आंतक का दौर'' (Reign of Terror) नामक एक युग आया, जिसमें अनेक नोबलों, पादरियों तथा कुछ क्रांतिकारियों को भी मृत्युदंड दिया गया। यह दौर तीन वर्ष तक चला।

vii) 1795 में डायरेक्टोरेट की स्थापना की गई। चार वर्ष बाद 1799 में निकट के एक द्वीप कोर्सिका के एक युवा सैनिक अधिकारी ने डायरेक्टोरेट का तख्ता पलट दिया। इस युवक का नाम नेपोलियन बोनापार्ट था वह खुद डायरेक्टर बन गया और उसने फ्रांस में स्थिर सरकार उपलब्ध कराई, जिसकी फ्रांसवासी लंबे समय से कामना कर रहे थे। इस प्रकार डायरेक्टोरेट को सत्ता से हटाने वाले नेपोलियन बोनापार्ट के समय में फ्रांसीसी क्रांति का पटाक्षेप हुआ ।

औद्योगिक क्रांति
औद्योगिक क्रांति 1760 के आसपास ब्रिटेन में प्रारंभ हुई। औद्योगिक क्रांति से पहले इंग्लैंड, फिर अन्य यूरोपीय देशों तथा बाद में अन्य महाद्वीपों में भी लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में जबरदस्त बदलाव आया। विशेषकर इंग्लैंड द्वारा नए क्षेत्रों की खोज इसके साथ-साथ व्यापार एवं वाणिज्य में वृद्धि तथा इसके फलस्वरूप शहरों में विकास के कारण यूरोप में चीजों की मांग बढ़ने लगी। कपड़ा जैसी परंपरागत उपभोक्ता वस्तुओं का निर्माण पहले घरेलू स्तर पर होता था। उत्पादन की घरेलू परंपर प्रचलित थी इसमें बदलाव आया।

 नये अन्वेषण
औद्योगिक क्रांति के दौरान नए औज़ारों तथा नई तकनीकों का विकास हुआ, जिनसे व्यापक पैमाने पर वस्तुएं तैयार हो सकती थीं। 1760 से 1830 के बीच औज़ारों, तकनीकों और उत्पादन के प्रबंध में कई नए आविष्कार हुए जिनसे उत्पादन की फैक्टरी प्रणाली अस्तित्व में आई। इस प्रकार उत्पादन की सामंतवादी प्रणाली के स्थान पर पूँजीवादी प्रणाली विकसित हुई।  1767 में एक अंग्रेज़ बुनकर जेम्स हारग्रीव्स ने स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किया। यह एक आयताकार सरल मशीन थी। इसमें कई कतुए(spindles) लगे थे, जिन्हें एक ही कताई चक्र से चलाया जा सकता था। 1769 में एक अंग्रेज नांई आर्कराइट ने वाटर फ्रेम मशीन ईजाद की। यह मशीन इतनी बड़ी थी कि इसे घर में रखना मुश्किल था इसलिए इसे लगाने के लिए विशेष इमारत की ज़रूरत पड़ी। यहीं से फैक्टरी प्रणाली का सूत्रपात हुआ ।

1779 में सैमुअल क्रांप्टन ने इंग्लैंड में “म्यूल” नाम की एक एक और मशीन बनाई। इनके अतिरिक्त और भी अनेक आविष्कार हुए, जिन्होंने यूरोपीय समाज के औद्योगिक विकास में योगदान दिया।

 समाज पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव
समाज की अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के फलस्वरूप अनेक सामाजिक परिवर्तन होने लगे। पूँजीवाद के और जटिल बन जाने पर बैंक, बीमा कम्पनियों, वित्तनिगम आदि का गठन हुआ। 

इसके फलस्वरूप औद्योगिक कामगारों, प्रबंधकों तथा पूँजीपतियों का नया वर्ग उभरा। औद्योगिक समाज में अन्य लोगों की भांति कपड़ा मिल में किसान भी सूत लपेटने लगे। गांवों के खुले वातावरण की बजाय वे तंग और दूषित माहौल में रहने लगे। 

उत्पादन बढ़ने से जनसंख्या में वृद्धि होने लगी। इससे शहरीकरण में तेजी गई। औद्योगिक शहरों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ने लगी। औद्योगिक शहरों में आर्थिक-सामाजिक विषमता बहुत अधिक थी। 

कारखानों के कारीगरों का रोज़ एक-ही तरह का काम करने से मनउचाट होता था और उन्हें अपने काम से संतुष्टि नहीं मिलती थी। 

औद्योगिक समाज में शहरी जीवन एकदम अलग तरह का नीरस जीवन हो गया। 

परंपरावादी तथा परिवर्तनवादी दोनों तरह के विचारकों पर इन परिवर्तनों का प्रभाव पड़ा। 

परंपरावादियों को आशंका हुई कि इन स्थितियों से अराजकता और अव्यवस्था फैलेगी ऐंगल्स जैसे परिवर्तनकारी चिंतकों का विचार था कि औद्योगिक श्रमिकों द्वारा सामाजिक परिवर्तन का सिलसिला शुरू होगा। 

यद्यपि सामाजिक चिंतकों में मूल्यों के प्रति दृष्टिकोण में भिन्नती थी किंतु इस बारे में सभी एकमत थे कि औद्योगिक क्रांति का बहुत जोरदार असर हुआ है। अधिकारों के लिए श्रमिक वर्ग के संघर्ष में निरंतर वृद्धि होती गई।

औद्योगिक क्रांति के महत्वपूर्ण विषय
प्रारंभिक समाजशास्त्रियों ने इस क्रांति के जिन महत्वपूर्ण विषयों पर चिंतन किया, वे इस प्रकार

1) श्रमिकों की स्थिति: 

कारखानों में काम करके अपनी आजीविका कमाने वालों का एक नया वर्ग उभरा। प्रारंभिक वर्षों में इन लोगों ने गरीबी तथा बदहाली में अपनी जिंदगी गुजारी। सामाजिक दृष्टि से वे उपेक्षित थे। किंतु साथ ही नई औद्योगिक व्यवस्था में उनकी भूमिका अनिवार्य थी। इससे वे शक्तिशाली सामाजिक ताकत बन गए। समाजशास्त्रियों ने कहा कि इस वर्ग की निर्धनता स्वाभाविक निर्धनता नहीं बल्कि सामाजिक विपन्नता थी। इसलिए उन्नीसवीं शताब्दी में श्रमिक वर्ग नैतिक तथा चिंतन दोनों दृष्टियों से विचार का विषय बन गया है।

2) गरीबी का रूपांतरणः 

औद्योगिक क्रांति के दौरान “भूमि” पर परम्परागत अधिकार का महत्व समाप्त हो गया तथा धन या पूँजी का महत्व बढ़ गया। नई औद्योगिक प्रणाली में पूँजी निवेश अधिक प्रभावी हो गया। 

सामंतवादी भूस्वामियों का जोर कम होने लगा तथा सत्ता नए पूँजीपतियों के हाथ में पहुंच गई। यद्यपि इनमें से कई पूँजीपति पहले के भूस्वामी ही थे। फ्रांसीसी क्रांति में भी जिन मुद्दों को उठाया गया, उनमें गरीबी एक प्रमुख समस्या थी  

सामाजिक व्यवस्था पर उसका पर्याप्त प्रभाव था। गरीबी का सीधा संबंध सदैव ही आर्थिक विशेषाधिकारों, सामाजिक परिस्थिति और राजनीतिक सत्ता से है। सम्पत्ति के ढाँचे में परिवर्तन से समाज के बुनियादी स्वरूप में बदलाव आता है। 

मार्क्स, तोकविल्ल, ताइन और वेबर के समय से ही सम्पत्ति और सामाजिक वर्गीकरण पर संपत्ति का प्रभाव' जैसे प्रश्न समाजशास्त्रियों के लिए चर्चा का विषय बने रहे हैं।

3) औद्योगिक नगर अर्थात् शहरीकरणः 

शहरीकरण का अनिवार्य परिणाम औद्योगीकरण था। उद्योगों के विकास के साथ-साथ बड़ी-बड़ी बस्तियां, आधुनिक शहर एवं कस्बे बसने लगे। वैसे तो प्राचीन काल में भी रोम, एथेंस आदि नगर थे, किंतु नए नगर जैसे कि इंग्लैंड का वस्त्र उद्योग केंद्र मैनचेस्टर आदि अपने स्वरूप में प्राचीन नगरों से एकदम भिन्न थे। पुराने नगर सुसभ्य गरिमा तथा महत्व के लिए विख्यात थे, जबकि इन नए शहरों में दुःख और अमानवीयता का माहौल था। नए शहरों के इन्हीं पहलुओं को लेकर प्रारंभिक समाजशास्त्री चिंतित थे।

4) प्रौद्योगिकी और कारखाना प्रणालीः 

प्रौद्योगिकी तथा कारखाना प्रणाली पर उन्नीसवीं शताब्दी में असंख्य पुस्तकें लिखी गई। परंपरावादी तथा परिवर्तनवादी दोनों प्रकार के विचारकों ने अनुभव किया कि ये दोनों प्रणालियां मनुष्य के भावी जीवन को बहुत हद तक प्रौद्योगिकी और कारखाना प्रणाली के कारण बड़ी संख्या में गांवों के लोग शहरों में बसने लगे। महिलाएं तथा बच्चे भी श्रमिकों के साथ कारखानों में काम करने लगे। इससे पारिवारिक संबंधों में बदलाव गया। कारखाने के सायरन की आवाज़ लोगों के जीवन की नियंता बन गई। काम पर मनुष्य की बजाय मशीन का प्रभुत्व हो गया .श्रमिक तथा उसके श्रम के उत्पाद के बीच संबंध बदल गया। श्रमिक अब वेतन पाने के लिए काम करता था। वस्तु के प्रति किसी का अपनत्व भाव नहीं रहा था और वह मशीन की उत्पत्ति मानी जाती थी। उस पर फैक्टरी के मालिक का ही अधिकार था। जीवन तथा काम में पहले की भांति पाये जाने वाला जुड़ाव समाप्त हो गया था। मार्क्स के अनुसार, मनुष्य मशीन का गुलाम बन गया तथा इसके परिणामस्वरूप श्रमिक उत्पादन से अलगावित हो गया। समाजशास्त्रियों की राय थी कि उत्पादन की औद्योगिक प्रणाली के फलस्वरूप श्रमिक वर्ग बौद्धिक, मानसिक तथा व्यावहारिक रूप से यांत्रिक हो गया था

सामाजिक परिस्थितियाँ
यूरोप उस समय फ्रांसीसी तथा औद्योगिक क्रांतियों के कारण अनंत परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा था। चौदहवीं से अट्ठारहवीं शताब्दी के बीच हुई वाणिज्यिक क्रांति एवं वैज्ञानिक क्रांति का काल पुनर्जागरण युग” (renaissance) कहलाता है। इस युग में कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान, मूर्तिकला आदि सभी विषयों को नया जीवन मिला।

वाणिज्यिक क्रांति
वाणिज्यिक क्रांति का संबंध सन् 1450 से लगभग सन् 1800 के बीच हुए घटनाक्रम से है।वाणिज्यिक क्रांति का अभिप्राय पंद्रहवीं शताब्दी के बाद हुए व्यापार तथा वाणिज्य के विस्तार से है। यह विस्तार इतना व्यापक तथा सुव्यवस्थित था कि इसे क्रांति का नाम दिया गया है। यह विस्तार वास्तव में कुछ यूरोपीय देशों द्वारा अपनी आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता को बढ़ाने तथा सुदृढ़ करने के लिए किए प्रयासों का परिणाम था। ये देश थे - पुर्तगाल, स्पेन, हॉलैंड और इंग्लैंड।  भारत, चीन जैसे प्राच्य अथवा पूर्वी देशों के साथ यूरोप का व्यापार स्थल मार्ग से होता था। इटली के उत्तरी शहर वेनिस तथा जेनोआ व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे। । वास्को डि गामा अफ्रीका के दक्षिणी तट से होता हुआ 1498 में भारतीय तट पर उतरा था। इटलीवासी क्रिस्टोफर कोलम्बस भी स्पेन के राजा तथा महारानी के संरक्षण में भारत की खोज पर निकला था। किन्तु वह उत्तरी अमरीका जा पहुंचा। अमरीका की इस संयोगमय खोज से स्पेन को बहुत लाभ हुआ। इससे अमरीका पर स्पेन के साम्राज्य की नींव पड़ गई। ब्रिटेन, फ्रांस तथा हॉलैंड भी स्पेन और पुर्तगाल का अनुसरण करने लगे। इसके फलस्वरूप भारत और अफ्रीका के कुछ भाग, मलक्का, स्पाइस आइलैंड, वेस्ट इंडीज व दक्षिण अमरीका पर स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैंड, फ्रांस और हॉलैंड का आर्थिक नियंत्रण हो गया। व्यापार ने विश्व-व्यापी उद्यम का रूप ले लिया। यूरोपीय मंडियों में पूर्व से मसाले और कपड़ा, उत्तरी अमरीका से तम्बाकू, दक्षिण अमरीका से चॉकलेट, कोको और कुनीन तथा अफ्रीका से हाथी दांत जैसी वस्तुएं खूब पहुँचने लगीं। इसके अतिरिक्त अफ्रीका से लोगों को दास बनाकर भी लाया जाने लगा। अमरीका की खोज के बाद व्यापार का क्षेत्र और फैल गया। शुरू में दूसरे देशों से मसाले तथा कपड़ा आदि अधिक मंगाए जाते थे, किन्तु बाद में इस सूची में सोना और चांदी भी जुड़ गए। 

बैंकिंग व्यवस्था का विस्तार
 बैंकिंग का विकास वाणिज्यिक क्रांति का एक प्रमुख पहलू था । ऋण सुविधाओं का विस्तार किया गया, जिससे व्यापारियों के लिए समूचे यूरोप में व्यापार करना सरल हो गया। अट्ठारहवीं शताब्दी में "चैक” का आविष्कार हुआ। सोने और चांदी के सिक्कों के स्थान पर कागज़ की मुद्रा का चलन हो गया।

कंपनियों का विकासः व्यापार तथा वाणिज्य में लगातार वृद्धि को देखते हुए नए प्रकार के व्यापार । संगठनों की आवश्यकता महसूस होने लगी। सोलहवीं शताब्दी में "नियमित” कंपनियाँ अस्तित्व में आईं। ये कंपनियाँ अपने-अपने उद्यमों में सहयोग के लिए इकट्ठे हुए व्यापारियों के संघ थे। सत्रहवीं शताब्दी में संयुक्त पूँजी” कंपनियों का उदय हुआ। इस व्यवस्था में पूँजी के शेयर । (shares of capital) अनेक निवेशकों में बंटे रहते थे। इनमें से कुछ कंपनियाँ चार्टर्ड कंपनियां थीं, जिन्हें सरकार की ओर से क्षेत्र विशेष में व्यापार के एकाधिकार की गारंटी मिली हुई थी। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तथा उच्च ईस्ट इंडिया कंपनी इसी प्रकार की कंपनियां थीं।

नए वर्ग का उदय
 इस युग की एक प्रमुख विशेषता मध्यम वर्ग के हाथों में आर्थिक सत्ता का पहुँचना था। सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक लगभग सभी यूरोपीय देशों में मध्यम वर्ग प्रभावशाली वर्ग के रूप में उभर चुका था। इनमें व्यापारी, बैंकर, जहाज-मालिक, पूँजीनिवेशक आदि शामिल थे। इस स्तर पर आर्थिक शक्ति ही उनकी मुख्य ताकत थी। विश्व का यूरोपीकरण” ( अन्य देशों द्वारा यूरोपीय तौर-तरीकों तथा संस्कृति को अपना लिया जाना ) व्यापारियों, मिशनरियों और अमरीकी क्षेत्रों पर विजय ने अमरीका के यूरोपीकरण में सहयोग दिया। बाद में उपनिवेशबाद के कारण एशिया तथा अफ्रीका में भी इस प्रक्रिया का प्रभाव हुआ। इस काल में राजतंत्र मजबूत हुआ, धर्म का प्रभाव कम हुआ और मध्यम वर्ग का उदय हुआ। यह यूरोपीकरण” की प्रक्रिया की शुरूआत थी, जो उपनिवेशवाद के साथ शिखर पर पहुँच गई। इस प्रकार, यूरोप को आर्थिक विस्तार के नए क्षेत्र मिल गए और उसको आर्थिक प्रभुत्व सारे संसार तक फैल गया।

 वैज्ञानिक क्रांति
“पुनर्जागरण काल” में यूरोप में “वैज्ञानिक क्रांति” हुई। इस वैज्ञानिक क्रांति के प्रभाव से न केवल मनुष्य के भौतिक जीवन में परिवर्तन हुआ, बल्कि प्रकृति और समाज के प्रति मनुष्य के विचारों में भी बदलाव आया।
इससे विज्ञान के क्षेत्र में व्याख्या और समालोचना के युग का सूत्रपात हुआ। यह अतीत से एक स्पष्ट विच्छेद था और प्राचीन सत्ता के लिए एक चुनौती थी।

इस काल में कला और विज्ञान के क्षेत्र की कुछ प्रमुख घटनाओं 
चित्रकला: इस युग में कला, साहित्य तथा विज्ञान सभी का विकास हुआ। प्रकृति और मानव शरीर के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह तथ्य उस काल के उन चित्रों में झलकता है, जिनमें प्रकृति तथा मानव शरीर की सूक्ष्मताओं को चित्रित किया गया था।

चिकित्सा: चिकित्सा में जांच पड़ताल के लिए मृत मानव शरीर की चीड़-फाड़ करने की स्वीकृति दे दी गई। डॉक्टरों और चिकित्सकों ने शरीर की रचना का प्रत्यक्ष रूप से निरीक्षण किया। इस प्रकार, शरीर रचना विज्ञान (anatomy); शरीर क्रिया विज्ञान (physiology) तथा रोगविज्ञान (pathology) में पर्याप्त प्रगति हुई।

रासायनिकी: रासायनिकी का एक सामान्य सिद्धांत विकसित हुआ। ऑक्सीकरण (oxidation), अपचयन (reduction), आसवन (distillation), सम्मिश्रण (amalgamation) जैसी रासायनिक क्रियाओं का अध्ययन किया गया।

समुद्र यात्रा तथा खगोल विद्या: वास्को डि गामा 1498 में भारतीय तट पर पहुंचा। कोलम्बस, ने 1492 में अमरीका की खोज की।  यही व्यापार के विस्तार तथा उपनिवेशवाद के प्रारम्भ का युग था। इसी समय खगोल विद्या में भी लोगों की रुचि बढ़ी क्योंकि इस विद्या की समुद्र-यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कॉपर्निकस क्रांति
डच वैज्ञानिक निकोलस कॉपर्निकस का सिद्धांत प्राचीन विचारधारा की समूची परम्परा से पहला प्रमुख विच्छेद था। यह आम धारणा थी कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य तथा अन्य नक्षत्र आदि उसके चारों ओर घूमते हैं (इसे “भूकेन्द्रिक" सिद्धांत कहा जाता है)। किन्तु कॉपर्निकस का विचार भिन्न था। उसने विस्तृत व्याख्याओं की सहायता से यह सिद्ध किया कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है (यह सूर्य केंद्रित सिद्धांत कहलाता है)। कॉपर्निकस के योगदान को क्रांतिकारी माना जाता है, क्योंकि उससे ब्रह्मांड के प्रति विचारधाओं में आमूल परिवर्तन हो गया। अब मनुष्य को ब्रह्माँड का केंद्र नहीं, बल्कि उसका एक अंश मात्र समझा जाने लगा।  पुनर्जागरण काल में विज्ञान ने मनुष्य और प्रकृति के प्रति नए दृष्टिकोण को । जन्म दिया। प्राकृतिक वस्तुएं निरीक्षण तथा परीक्षण का विषय बन गईं। कॉपर्निकस क्रांति ने उस आधार को ही धराशायी कर दिया, जिस पर पुराना विश्व खड़ा था।

पुनर्जागरण युग के बाद प्रमुख वैज्ञानिक परिवर्तनों 

भौतिकी तथा गणित में प्रयोग
गैलीलियो गैलीली (1569-1642), जोहनिस केप्लर (1571-1630) तथा बाद में आइसक न्यूटन (1642-127) जैसे भौतिकी वैज्ञानिकों तथा गणितज्ञों की उपलब्धियों से विज्ञान के स्वरूप में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। इससे प्रायोगिक पद्धति (experimental method) को प्राथमिकता मिलने लगी। इसके फलस्वरूप पुराने विचारों को चुनौती दी गई तथा वैकल्पिक विचार सुझाए गए। ये वैकल्पिक विचार सिद्ध हो जाने पर और बार-बार परीक्षण सफल हो जाने पर स्वीकृत कर लिए जाते थे। ऐसा न होने पर नए समाधान खोजे जाते थे। इस प्रकार, वैज्ञानिक विधियों को सबसे सही और निष्पक्ष माना जाने लगा।

जीव विज्ञान तथा विकासवाद का सिदांत
विलियम हार्वे (1578-1657) ने रक्त के प्रवाह की खोज की। इससे कई प्रकार के नए चिंतन को बल मिला। मनुष्य के शरीर को अब एक-दूसरे के जुड़े अवयवों और परस्पर सम्बद्ध प्रणालियों के संदर्भ में देखा जाने लगा। इस नए ज्ञान का कॉम्ट, स्पेंसर, दर्खाइम तथा अन्य विद्वानों के सामाजिक चिंतन पर गहरा प्रभाव पड़ा।  जीव विज्ञान के एक अत्यंत रोचक योगदान, जिसने उस समय के समाज को उत्तेजित कर दिया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन (1809-1882) ने 1859 में अपनी पुस्तक “ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़” प्रकाशित की। यह पुस्तक उनके विश्व भर के पांच वर्ष लंबे भ्रमण के अनुभवों पर आधारित थी। डार्विन ने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि पृथ्वी पर उपलब्ध सीमित संसाधनों के उपभोग के लिए विभिन्न जीव एक दूसरे से होड़ करते रहते हैं। इसलिए "सर्वोपयुक्त का जीवित रहना” प्राकृतिक नियम है कुछ जीव ऐसी विशेषताएं विकसित कर लेते है, जिनके कारण उनका अस्तित्व बना रहता है, जबकि अन्य जीव (स्पीशीज़) लुप्त हो जाते हैं। डार्विन ने मानवीय विकास का अध्ययन किया, जिसका उल्लेख उसकी पुस्तक "डिसेंट ऑफ मैन' (1863) में किया गया है। उसने कहा कि मनुष्य का पूर्वज बंदर जैसा प्राणी था, जिसका अनेक शताब्दियों में मनुष्य के रूप में विकास हुआ है। इस पुस्तक ने समाज को उत्तेजित कर दिया। इससे पहले यह माना जाता था कि ईश्वर ने ही अपनी छवि में मनुष्य की रचना की । है। रूढ़िवादियों ने इस मान्यता को अस्वीकार कर दिया कि मनुष्य की उत्पत्ति बंदर से हुई है। किंतु डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को व्यापक स्वीकृति मिली। विकासवादी विचारकों, विशेषकर हर्बर्ट स्पेंसर, ने इस सिद्धांत को सामाजिक जगत पर लागू किया। स्पेंसर का मत था कि न केवल जीव बल्कि समाज का भी निम्न अवस्था से उच्च अवस्था की ओर विकास होता है।

समाजशास्त्र के उदय पर बौद्धिक प्रभाव
अट्ठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान यूरोप में हुए परिवर्तनों के फलस्वरूप समाजशास्त्र का उदय हुआ।  प्रारंभिक समाजशास्त्र मुख्यत: अट्ठारहवीं शताब्दी के प्रबोधन के चिन्तकों से प्रभावित है। अत: प्रबोधन ही समाजशास्त्रीय सिद्धांत की उत्पत्ति के अध्ययन का सर्वाधिक उपयुक्त परिवर्तन-बिन्दु प्रतीत होता है। इस युग की तीन धारणाएं प्रमुख थीं।

पहली धारणा थी कि समाज के अध्ययन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की शुरुआत प्रबोधन की परंपरा में हुई। प्राकृतिक विज्ञानों की विधियां अपनाते हुए अपने सभी पूर्ववर्ती विचारकों की तुलना से अधिक युक्तिसंगत ढंग से सामाजिक दशाओं का अट्ठारहवीं शताब्दी के विचारकों ने वैज्ञानिक अध्ययन प्रारंभ किया। मनुष्यों और उनकी प्रकृति तथा समाज का अध्ययन करने के लिए इन विचारकों ने विश्लेषण के वैज्ञानिक सिद्धांतों का इस्तेमाल किया।

दूसरी धारणा थी कि सामाजिक संस्थाओं तथा प्राकृतिक परिवेश से उनके संबंधों की उपयुक्तता को जांचने के लिए उन्होंने तर्क को मापदंड के रूप में अपनाया। उनकी मान्यता थी कि मनुष्य अनिवार्य रूप से तर्कसंगत हैं और यह तार्किकता उसे विचार एवं कर्म की स्वतंत्रता दिला सकती

 तीसरी धारणा थी कि उनका विश्वास था कि मनुष्य उत्कृष्टता प्राप्त करने में सक्षम हैं। सामाजिक परंपराओं की आलोचना करके तथा उन्हें बदलकर यह संभव हो जाता है कि वे अपने लिए अधिक मात्रा में स्वतंत्रता हासिल करें, जिसके फलस्वरूप उनकी सृजनात्मक शक्तियों को अधिक व्यावहारिक रूप मिल सकता है।

इनके अतिरिक्त प्रबोधन युग के बाद की निम्नलिखित तीन अन्य बौद्धिक अवधारणाओं ने भी यूरोप में समाजशास्त्र के उदय को प्रभावित किया।

i) इतिहास का दर्शन
ii) विकास के जीव वैज्ञानिक सिद्धांत
iii) सामाजिक स्थितियों के सर्वेक्षण

ये तीन बौद्धिक दृष्टिकोण समाजशास्त्र के अग्रदूत सिद्ध हुए और प्रारंभिक समाजशास्त्रियों की रचनाओं में इनकी पूरी झलक मिलती है

इतिहास का दर्शन-
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में इतिहास का दर्शन एक महत्वपूर्ण बौद्धिक दृष्टिकोण बन गया। इस दर्शन की बुनियादी अवधारणा यह थी कि समाज सरल से जटिल अवस्था की ओर बढ़ने में निश्चय ही कई चरणों में से होकर गुजरता है। समाजशास्त्र में इतिहास के दर्शन के योगदान को यहाँ संक्षिप्त मूल्यांकन किया जा सकता है। दार्शनिक स्तर पर इस धारणा ने विकास तथा प्रगति के विचार दिए हैं तथा वैज्ञानिक स्तर पर ऐतिहासिक युगों और सामाजिक प्ररूपों की अवधारणाएं प्रदान की हैं। अब्ब सेंट पियरे और गियाम्बातिस्ता जैसे समाजशास्त्रियों ने इतिहास के दर्शन का विकास किया। वे समाज के केवल आर्थिक, राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक पहलुओं के नहीं अपितु समूचे समाज के अध्ययन के लिए विचारशील थे बोटोमोर 1962:14-15)। बाद में कॉम्ट, स्पेंसर, मार्क्स तथा अन्य अनेक विचारकों की समाजशास्त्रीय रचनाओं में भी इस बौद्धिक प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं।

विकास के जीव वैज्ञानिक सिद्धांत-
विकास के जीव वैज्ञानिक सिद्धांत ने इतिहास के दर्शन के प्रभाव को और पुष्ट कर दिया। समाजशास्त्र विकासवादी दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होने लगा, जिसमें सामाजिक विकास के प्रमुख चरणों को जानने की कोशिश शामिल थी। इस दृष्टिकोण का स्वरूप जीव विज्ञान की तरह का था, जिसमें समाज की विस्तृत अवधारणा को एक जीव के रूप में माना गया। इसके साथ-साथ सामाजिक विकास की सामान्य पदावली निर्धारित करने के प्रयास भी किए गए। हर्बर्ट स्पेंसर तथा दर्खाइम इस प्रकार का चिंतन तथा लेखन करने वालों के अच्छे उदाहरण हैं।

सामाजिक परिस्थितियों के सर्वेक्षण-

सामाजिक सर्वेक्षण आधुनिक समाजशास्त्र का महत्वपूर्ण तत्व है। इसका उदय दो कारणों से हुआ।एक कारण है; बढ़ता हुआ यह विश्वास कि प्राकृतिक विज्ञान की अध्ययन विधियाँ मानवीय विषयों के अध्ययन परं लागू की जानी चाहिए और ये विधियाँ लागू की जा सकती हैं। इनके आधार पर मानवीय कार्यकलापों का वर्गीकरण तथा मूल्यांकन संभव है। दूसरा कारण है गरीबी के प्रति चिंता (सामाजिक समस्या) जो इस मान्यता पर आधारित है कि गरीबी प्राकृतिक नहीं बल्कि सामाजिक स्थिति है और सामाजिक सर्वेक्षण से इस समस्या का निदान कर पाना संभव है। सामाजिक सर्वेक्षण समाजशास्त्रीय अन्वेषण की एक प्रमुख विधि है। इस विधि का बुनियादी सिद्धांत यह है कि सामाजिक स्थितियों के ज्ञान से ही समाज में मौजूद सामाजिक समस्याओं को समझा जा सकता है तथा समझने के बाद उनके समाधान ढंढे जा सकते हैं।

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