समाजशास्त्र का विषय - क्षेत्र तथा अन्य सामाजिक विज्ञानों से इसकी तुलना :
विषय क्षेत्र का तात्पर्य अध्ययन की उस सीमा से होता है जिसके अंतर्गत ज्ञान की किसी शाखा को विकसित किया जाता है दूसरी ओर, विषयवस्तु का संबंध उन प्रमुख विषयों से है जिनके ज्ञान का किसी शाखा के अंतर्गत हमवास्तव में अध्ययन करते हैं।
इस प्रकार क्षेत्र' एक अनुमानित परिधि है जबकि विषय वस्तु को अध्ययन की वास्तविक सीमा कहा जा सकता है ।
समाजशास्त्र की सभी परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि अधिकांश विद्वान समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों का अध्ययन मानने के पक्ष में हैं लेकिन समाजशास्त्र में किस प्रकार के सामाजिक संबंधों का अध्ययन होना चाहिए, इसी प्रश्न को लेकर समाजशास्त्र के विषय - क्षेत्र के बारे में विद्वानों में मतभेद रहा है ।इस विवाद ने दो संप्रदायों को जन्म दिया।
स्वरूपात्मक अथवा विशेषात्मक संप्रदाय (Formal School)
समन्वयात्मक अथवा सामान्य संप्रदाय (Synthetic School)
स्वरूपात्मक (फार्मल) या विशिष्टात्मक (स्पेशलिस्टिक) संप्रदाय -इसके अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष सामाजिक विज्ञान है जिसमें कुछ विशेष प्रकार के संबंधों का ही अध्ययन करना आवश्यक है। इस संप्रदाय के मतानुसार समाजशास्त्र एक विशिष्ट एवं स्वतंत्र विज्ञान है। समाजशास्त्र का एक विशिष्ट क्षेत्र है जो कि अन्य सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र से भिन्न है। अन्य विज्ञानों की भांति इसका भी स्वतंत्र अस्तित्व है। इस संप्रदाय के अनुयायी वस्तु के स्वरूप तथा अंतर्वस्तु( कंटेंट) में भिन्नता मानते हैं। वस्तु के आकार तथा उसमें विद्यमान पदार्थ दो विभिन्न वस्तुएँ हैं। वह दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं। इस संप्रदाय के समर्थक हानीज, जार्ज सिमल, रिचर्ड, वीरकांट, पकं इत्यादि।
समन्वयात्मक अथवा सामान्य संप्रदाय -यह संप्रदाय समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र को व्यापक बनाने के पक्ष में है | इसके अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है। जिसमें सभी प्रकार के सामाजिक संबंधों का अध्ययन किया जाना चाहिए। इस संप्रदाय के समर्थकों के मतानुसार समाजशास्त्र समस्त विशिष्ट सामाजिक विज्ञानों का समन्वय है और सामान्य विज्ञान के रूप में सामाजिक संबंधों के सामान्य स्वरूप का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र के अंतर्गत वे समस्त घटनाएँ आती हैं जोकि सामान्य रूप में सामाजिक जीवन में विद्यमान हैं, जिन्हें उनकी सामान्य प्रकृति के कारण अन्य सामाजिक विज्ञान अपनी परिधि में नहीं समेट पाए। इस विचारधारा के समर्थक हैं दुखम, हॉबहाउस, सोरोकिन, जिन्सबर्ग आदि। दुर्वीम, सोरोकिन तथा हॉबहाउस इन समाजशास्त्र के विचारकों ने समन्वयात्मक संप्रदाय के संबंध में दो प्रमुख तर्क प्रस्तुत किए हैं :
1.सर्वप्रथम समाज के विभिन्न अंग एक-दूसरे से उसी तरह संबंधित होते हैं जिस प्रकार एक जीव रचना के विभिन्न अंग एक-दूसरे से पृथक् होते हुए भी एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। इसका अर्थ है कि जब कभी भी सामाजिक जीवन के किसी एक पक्ष में कोई परिवर्तन होता है तो यह समाज के अन्य पक्षों को भी प्रभावित करता है। समाजशास्त्र को यदि कुछ विशेष प्रकार के संबंधों का अध्ययन मान लिया जाय तो इस विज्ञान के द्वारा समाज के विभिन्न भागों की पारस्परिक निर्भरता को नहीं समझा जा सकता। समाज के विभिन्न भागों के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किसी भी दूसरे सामाजिक विज्ञान के द्वारा नहीं किया जाता। इस प्रकार यह कार्य समाजशास्त्र का है कि वह समाज का अध्ययन एक समग्रता के रूप में करे जिससे इसके विभिन्न भागों के बीच पाये जाने वाले पारस्परिक संबंधों तथा पारस्परिक निर्भरता को स्पष्ट किया जा सके।
2.समन्वयात्मक संप्रदाय के समर्थकों ने दूसरा तर्क यह दिया कि अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कानून अथवा इसी तरह के अन्य सामाजिक विज्ञान अपनी प्रकृति से विशिष्ट हैं जो सामाजिक जीवन के किसी एक पक्ष का ही अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, अर्थशास्त्र केवल आर्थिक संबंधों का तथा राजनीतिशास्त्र केवल राजनैतिक जीवन का अध्ययन करता है। इसप्रकार यह कार्य समाजशास्त्र का है कि यह सामाजिक जीवन के सभी पक्षों का अध्ययन एक सामान्य दृष्टिकोण के द्वारा करे।
निष्कर्ष -
समाजशास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र से संबंधित स्वरूपात्मक तथा समन्वयात्मक संप्रदाय के विचार देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यह दोनों संप्रदाय एक-दूसरे के विरोधी हैं। वास्तविकता यह है कि इन दोनों संप्रदायों के विचारों में कोई आधारभूत अंतर नहीं है। इसका कारण यह है कि कोई विज्ञान न तो पूर्णतया विशेष हो सकता है और न ही वह प्रत्येक दशा में सामान्य हो सकता है। समाजशास्त्र भी न तो पूर्णतया एक विशिष्ट विज्ञान है। जिसमें सामाजिक संबंधों के कुछ विशेष स्वरूपों का ही अध्ययन किया जाता है और न ही यह एक ऐसा विज्ञान है जिसमें अध्ययन की जाने वाली सभी सामाजिक घटनाएँ पूर्णतया सामान्य हैं।
अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा कानून आदि जिन विशेष सामाजिक विज्ञानों को समाज की कुछ विशिष्ट दशाओं का ही अध्ययन करने वाला विज्ञान माना जाता है, उनमें भी समाज की अनेक सामान्य विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है। दूसरी ओर समाजशास्त्र के अंतर्गत भी अनेक ऐसे संबंधों का अध्ययन किया जाता है जो अपनी प्रकृति से विशेष होते हैं।इसका तात्पर्य है कि विशिष्ट और सामान्य संबंधों को पूर्णतया एक-दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता।
“समाज सामाजिक संबंधों की एक जटिल व्यवस्था है जिसमें विशिष्ट और सामान्य सभी तरह के संबंधों का समावेश होता है। इस प्रकार यह उचित प्रतीत होता है कि समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र में सामान्य तथा विशिष्ट, सभी प्रकार के संबंधों को समान महत्व दिया जाय।'' इसप्रकार समाजशास्त्र को जो कि एक प्रगतिशील विज्ञान है, किसी सीमा में आबद्ध नहीं किया जा सकता। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन की गई घटना समाजशास्त्र की विषय सामग्री है।
समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंध:
समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है और सामाजिक विज्ञान होने के नाते इसका संबंध अन्य विज्ञानों से भी है। कॉम्ट के अनुसार “समाजशास्त्र सबसे आधुनिक और एकमात्र सामाजिक विज्ञान है। समाज के विभिन्न अंग तथा घटनाएँ एक-दूसरे से संबंधित हैं और इसीलिए उनका अध्ययन अलग रूप से न करके समग्र रूप से किया जाता है। अर्थशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान आदि समाज की छोटी-छोटी घटनाओं का अध्ययन करते हैं। इसीलिए वे समाजशास्त्र की छत्रछाया में रहकर ही कार्य कर सकते हैं। अतः स्पष्ट है कि श्री कॉम्ट के अनुसार समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ किसी प्रकार भी संबद्ध नहीं है, अपितु समाजशास्त्र की खोजों के आधार पर ही अन्य सामाजिक विज्ञानों का अस्तित्व संभव होता है।
हरबर्ट स्पेन्सर ने अपने उद्विकासीय सिद्धांत के आधार पर अन्य विज्ञानों और समाजशास्त्र के संबंधों को समझाने का प्रयत्न किया है। इनका मत है कि समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है और समाज केवल व्यक्तियों का योग नहीं है। शरीर के विभिन्न अंगो की तरह समाज के सदस्यों के बीच भी एक समन्वय होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस समन्वय या समाज की एक-एक इकाई है और इन इकाइयों का समन्वय ही मोटे तौर पर समाज है। ये इकाइयाँ आपस में संबद्ध तथा एक-दूसरे पर आश्रित होती हैं। इसी प्रकार समाजशास्त्र के निर्माण में अन्य सामाजिक विज्ञान एक-एक इकाई का काम करते हैं। ये सामाजिक विज्ञान यद्यपि अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्र हैं, परंतु इनके समन्वय से ही समाजशास्त्र का निर्माण संभव होता है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग शरीर के साथ संबद्ध रहते हुए भी अलग रूप से कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञान भी समाजशास्त्र से संबद्ध रहते हुए स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। अत: स्पष्ट है कि समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों का समन्वय है और दूसरे सामाजिक विज्ञान उस समन्वय को उत्पन्न करने वाली विभिन्न इकाइयाँ हैं।'
सोरोकिन का मत है कि “प्रत्येक विज्ञान को अन्य दूसरे विज्ञानों से अपने अस्तित्व तथा विकास के लिए सहायता लेनी ही पड़ती है। इस रूप में किसी भी ऐसे विज्ञान का नाम नहीं लिया जा सकता जो पूर्णरूप से स्वतंत्र हो। समाजशास्त्र के बारे में भी यह बात लागू होती है। वास्तव में समाजशास्त्र का संबंध अन्य सभी विज्ञानों से है, किसी से अधिक तो किसी से कम। इसी संबंध के आधार पर समाजशास्त्र अन्य विज्ञानों से अध्ययन-सामग्री ग्रहण करता है और साथ ही अपने अध्ययनों द्वारा दूसरे विज्ञानों के अध्ययन-कार्य में सहायता करता है।'' इसीलिए श्री सोरोकिन का कहना है कि समाजशास्त्र एक नया विज्ञान है और इसीलिए इसे अपने विकास के लिए अन्य सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र का अन्य विज्ञानों के साथ एक लेनदेन का संबंध है और यह संबंध विभिन्न विज्ञानों के विकास के साथ-साथ और भी घनिष्ठ होता जाएगा।
बार्स और बेकर के अनुसार “आज सभी सामाजिक विज्ञान सामाजिक जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न पहलुओं व समस्याओं का किसी एक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सामान्य दृष्टिकोण से अध्ययन करते हैं। इसी के फलस्वरूप विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के बीच की दीवारें आज धीरेधीरे टूटती जा रही हैं और विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के मध्य पारस्परिक आदान-प्रदान व सद्भावना बढ़ती जा रही है।'' ५१ इसी संदर्भ में सर्वश्री बार्क्स और बेकर का निष्कर्ष है कि समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की न तो स्वामिनी है और न ही उनकी दासी, वरन् उसकी एक बहन मानी जाती है।
समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों से एक लेन-देन का संबंध बनाए रखते हुए सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करता है। इस लेन-देन के संबंध के फलस्वरूप समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ जो संबंध स्थापित हो गया है
समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र:
दोनों ही सामाजिक विज्ञान एक-दूसरे की सहायता प्राप्त कर सामाजिक घटनाओं को अपने-अपने दृष्टिकोण से अध्ययन करते हैं - दर्शनशास्त्र मनुष्य की प्रकृति के बारे में अध्ययन करता है। इसके लिए उसे समाजशास्त्र की हर संभव सहायता लेनी पड़ती है। इसी प्रकार दर्शनशास्त्र का प्रमुख आधार तर्क और कल्पना है। तर्क और कल्पना के लिए उसकी सामाजिक परिस्थितियों का भी अध्ययन करना पड़ता है जो कि समाजशास्त्र का अध्ययन विषय है। परंतु समाजशास्त्र के अंतर्गत रूढ़ियों, परंपराओं, जनरीतियों आदि का निर्माण तर्क और कल्पना के आधार पर ही किया जाता है और इसके लिए समाजशास्त्र को दर्शनशास्त्र पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके लिए दर्शनशास्त्र आदर्शों व मूल्यों का भी अध्ययन करता है। समाजशास्त्र इन्हीं मूल्यों व आदर्शों का सामाजिक पृष्ठभूमि में अध्ययन करता है।
कॉम्ट का कहना है कि समाजशास्त्र का दृष्टिकोण यद्यपि वैज्ञानिक है फिर भी उसको कल्याणकारी भी अवश्य होना चाहिए और इसके लिए उसे सामाजिक मूल्यों पर निर्भर रहना पड़ेगा जो कि दर्शनशास्त्र का अध्ययन-विषय है। मैकाइवर ने तो इस संबंध कहा है कि ‘‘बिना मूल्यों के समाज को नहीं समझा जा सकता है।''
दोनों विज्ञानों में अंतर - दोनों विज्ञानों में कुछ आधारभूत अंतर इस प्रकार है
-समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामाजिक होता है जबकि दर्शनशास्त्र का दृष्टिकोण दार्शनिक होता है।
-समाजशास्त्र एक नवीन सामाजिक विज्ञान है। जबकि तुलनात्मक दृष्टिकोण से दर्शनशास्त्र एक प्राचीन विज्ञान है।
-समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र विस्तृत है, जब कि दर्शनशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र संकुचित है।
अत: स्पष्ट है कि समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र एक-दूसरे से घनिष्ठत: संबंधित होते हुए भी एक नहीं है |
समाजशास्त्र और मनोविज्ञान:
मनोविज्ञान मानव-मस्तिष्क और उसकी क्रियाओं का अध्ययन करता है, परंतु यही मानव एक सामाजिक प्राणी भी है जो समाजशास्त्र का अध्ययन-विषय है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि दोनों विज्ञानों का पारस्परिक संबंध अति घनिष्ठ है। मनोविज्ञान मानव-मस्तिष्क की प्रक्रियाओं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले मानसिक विचारों और अनुभवों का अध्ययन है। मनोविज्ञान का प्रमुख सम्पर्क मानसिक प्रक्रियाओं से है। परंतु एक व्यक्ति की मानसिक प्रक्रियाएँ उसकी सामाजिक परिस्थितियों और अंत:क्रियाओं से न केवल संबंधित होती है बल्कि उनसे प्रभावित भी होती रहती है। अतः स्पष्ट है कि समाजशास्त्र तथा मनोविज्ञान में परस्पर घनिष्ठ संबंध है क्योंकि मानसिक प्रक्रियाएँ मनोविज्ञान का अध्ययन विषय है और सामाजिक प्रक्रियाएँ समाजशास्त्र का। इन दोनों विज्ञानों का पारस्परिक संबंध सामाजिक मनोविज्ञान के विकास के बाद और भी घनिष्ठ हो गया है। सामाजिक मनोविज्ञान इस सत्य को स्वीकार करता है कि मस्तिष्क का विकास स्वयं एक सामाजिक प्रक्रिया है क्योंकि इस विकास के प्रत्येक स्तर पर समाज और अन्य व्यक्तियों के बीच होने वाली अंत:क्रियाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से पड़ता है। जहाँ एक ओर व्यक्ति के मस्तिष्क के विकास में सामाजिक शक्तियाँ काम करती हैं, वहीं दूसरी ओर सदस्यों की मानसिक विशेषताएँ सामाजिक जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। इसी कारण इन दोनों पक्षों को
एक-दूसरे से अलग करके व्यक्ति या समाज किसी के बारे में भी उचित, पर्याप्त तथा वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं हो सकता। इन दोनों के मध्य सामाजिक मनोविज्ञान वह कड़ी है जो एक-दूसरे को आपस में मिलाती है। आर.एम. मैकाइवर ने लिखा है, “समाजशास्त्र उसी प्रकार विशेष रूप से मनोविज्ञान को सहायता देता है जिस प्रकार मनोविज्ञान समाजशास्त्र को विशेष सहायता प्रदान करता है।''
दोनों विज्ञानों में अंतर -
-समाजशास्त्र का मौलिक संबंध समाज और सामाजिक प्रक्रियाओं से है, जबकि मनोविज्ञान का संबंध व्यक्ति और उसकी मानसिक प्रक्रियाओं से है।
-मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार का आधार स्वयं मनुष्य की ही मानसिक विशेषताएँ हैं, जबकि समाजशास्त्र के अनुसार सामाजिक व्यवहारों का आधार सामाजिक संबंध और अंत:क्रियाएँ हैं।
-इस प्रकार मनोविज्ञान का दृष्टिकोण वैयक्तिक है, जबकि समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामाजिक
-समाजशास्त्र का अध्ययन क्षेत्र मनोविज्ञान से कहीं अधिक विस्तृत है क्योंकि इसका (समाजशास्त्र का) अध्ययन-विषय मानव का संपूर्ण सामाजिक जीवन है, जबकि मनोविज्ञान का अध्ययन विषय केवल मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं।
-मनोवैज्ञानिक अपना अध्ययन-कार्य मनोवैज्ञानिक परीक्षण और निरीक्षण के आधार पर करते हैं जबकि समाजशास्त्री वैयक्तिक-जीवन अध्ययन पद्धति, समाजनीति, सांख्यिकीय पद्धति आदि का प्रयोग करते हैं।
समाजशास्त्र और इतिहास:
इतिहास और समाजशास्त्र के संबंधों की निकटता को देखते हुए कुछ विद्वानों ने इन दोनों को एक ही माना है। इतिहास समाज की उन भूतकालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक घटनाओं की व्याख्या है जो वर्तमान पर भी कुछ-न-कुछ प्रभाव अवश्य डालती है। आज इतिहास में क्या था' के अतिरिक्त कैसे हुआ' का भी विश्लेषण किया जाता है। वास्तव में यही बात दोनों विज्ञानों को परस्पर निकट लाती है। एक ओर यदि समाजशास्त्र को इतिहास द्वारा दी गई प्राचीन घटनाओं के अध्ययन से वर्तमान का विश्लेषण करने में सहायता प्राप्त होती है तो दूसरी ओर समाजशास्त्र द्वारा की गई सामाजिक परिस्थितियों के अध्ययन का भी इतिहास में उल्लिखित ऐतिहासिक वर्णनों पर प्रभाव पड़ता है। यदि इतिहास युद्ध का वर्णन करता है तो समाजशास्त्र युद्ध को सामाजिक घटना के रूप में मानकर उसको प्रोत्साहन देने वाली प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। इसी से दोनों विज्ञानों का पारस्परिक संबंध स्पष्ट हो जाता है।
दोनों विज्ञानों में अंतर -
- इतिहास का संबंध अतीत से है, जबकि समाजशास्त्र का संबंध मुख्यत: वर्तमान से होता है।
-समाजशास्त्र सामान्य विज्ञान है क्योंकि यह सामाजिक जीवन की सामान्य घटनाओं का अध्ययन है, जबकि इतिहास विशिष्ट सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करता है और इस अर्थ में एक विशेष विज्ञान है।
- इतिहास का दृष्टिकोण ‘ऐतिहासिक' है जबकि समाजशास्त्र का दृष्टिकोण सामाजिक' है।
दोनों विज्ञानों में एक अंतर करते हुए पार्क ने लिखा है, 'इतिहास मानव-अनुभव और मानव-प्रकृति का मूर्त विज्ञान है, जबकि समाजशास्त्र अमूर्त विज्ञान है।
समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र:
समाजशास्त्र के विकास के आरंभिक काल में समाजशास्त्र को अर्थशास्त्र के विषय के एक भाग के रूप में ही पढ़ाया जाता था। इतना ही नहीं, काफी समय तक विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के अलग-अलग विभाग नहीं होते थे। यदि हम अर्थशास्त्र की परिभाषा करें तो हम इस शास्त्र को ‘धन' का विज्ञान कह सकते हैं।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. मार्शल ने अर्थशास्त्र की परिभाषा करते हुए कहा है, अर्थशास्त्र मनुष्य के जीवन की साधारण व्यापार संबंधी क्रियाओं का अध्ययन है। अर्थशास्त्र यह मालूम करता है कि मनुष्य किस प्रकार से धन कमाता है और किस प्रकार उसे खर्च करता है.... इस प्रकार यह एक ओर संपत्ति का अध्ययन है।
और दूसरी ओर जो आर्थिक महत्वपूर्ण है, ‘मनुष्य' के अध्ययन का एक भाग है।' इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र ‘मनुष्य' की आर्थिक क्रियाओं का समग्र रूप में अध्ययन करता है। इस रूप में दोनों विज्ञानों में घनिष्ठ संबंध होना स्वाभाविक है क्योंकि कोई भी आर्थिक संबंध सामाजिक संबंधों व दशाओं से अलग नहीं है। यदि मांग के नियम कों लिया जाए तो यह स्पष्ट होगा कि इस नियम के पीछे अनेक सामाजिक तथ्य कार्य करते हैं ; जैसे किसी वस्तु विशेष की माँग इस बात पर आधारित होगी कि वह वस्तु विलासिता, सुखकर या आवश्यकता, कौन से वर्ग में आती है, प्रथाओं व फैशन से उसका क्या संबंध है, आदि। इन सभी बातों का अध्ययन समाजशास्त्र करता है।
मैकाइवर ने इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि इस प्रकार आर्थिक घटनाएँ सदैव सामाजिक आवश्यकताओं और क्रियाओं के समस्त स्वरूपों द्वारा निश्चित होती है।'' इसके अतिरिक्त अनेक समाजशास्त्रीय समस्याएँ, जैसे विवाह की समस्या, अपराध की समस्या, वेश्यावृत्ति की समस्या आदि भी आर्थिक क्रियाओं से प्रभावित रहती हैं। इतना ही नहीं समाजशास्त्र अर्थशास्त्र की अध्ययन पद्धतियों का लाभ भी उठाता है। इस रूप में दोनों विज्ञानों को एक-दूसरे से सहायता लेनी पड़ती है।
दोनों विज्ञानों में अंतर :
-अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं का विज्ञान है, जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन से संबंधित घटनाओं का विज्ञान है।
-अर्थशास्त्र मानव-जीवन के एक विशिष्ट पक्ष-आर्थिक पक्ष- से संबंध है और समाजशास्त्र समग्र सामाजिक जीवन से अत: यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र अर्थशास्त्र से कहीं अधिक विस्तृत है।
-समाजशास्त्र में सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति, वैयक्तिक जीवन अध्ययन पद्धति, निरीक्षण पद्धति आदि पद्धतियों का प्रयोग होता है, जबकि अर्थशास्त्र में आगमन और निगमन पद्धति का प्रयोग होता है।
समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्रः
समाजशास्त्र के विकास के आरंभिक काल में समाजशास्त्र राजनीतिशास्त्र के एक प्रश्नपत्र के रूप में पढ़ाया जाता था। राजनीतिशास्त्र वह सामाजिक विज्ञान है जो मनुष्य की राजनीतिक क्रियाओं का अध्ययन करता है। स्पष्ट रूप में, राजनीतिशास्त्र की अध्ययन-वस्तु राज्य है, अर्थात् राजनीतिशास्त्र राज्य की उत्पत्ति, विकास और विशेषताओं, उसके उद्देश्य और महत्व, संगठन कार्य आदि का क्रमबद्ध अध्ययन करता है। ये सभी समाज के ही अंग हैं। वास्तव में राजनीतिशास्त्र मनुष्य को राजनीतिक प्राणी मानकर अध्ययन करता है, यद्यपि वह समाजशास्त्र की भाँति यह नहीं बताता है कि मनुष्य क्यों और कैसे राजनीतिक प्राणी बना यह बात राजनीतिशास्त्र को समाजशास्त्र से ही मालूम हुई।
प्रो. आर. एन. गिलक्राइस्ट ने राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र की पारस्परिक निर्भरता का वर्णन करते हुए लिखा है, “राजनीतिशास्त्र के अध्ययन में हमें मानव संबंधी उन तथ्यों एवं सिद्धांतों को अवश्य ग्रहण करना होगा जिन सिद्धांतों एवं तथ्यों का अध्ययन एवं प्रतिपादन करना समाजशास्त्र का कर्तव्य है।'' वास्तव में समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र दोनों एक-दूसरे पर अत्यधिक निर्भर हैं। इसीलिए समाजशास्त्र के अंतर्गत राजनीतिक समाजशास्त्र' नाम की एक शाखा भी विकसित हो गई है।
दोनों विज्ञानों में अंतर :
-समाजशास्त्र संपूर्ण सामाजिक जीवन का अध्ययन है, जबकि राजनीतिशास्त्र राजनीतिक जीवन का, जो संपूर्ण सामाजिक जीवन का केवल एक भाग है का अध्ययन करता है। अत: स्पष्ट है कि समाजशास्त्र का अध्ययन-क्षेत्र राजनीतिशास्त्र से कहीं अधिक विस्तृत है।
-समाजशास्त्र समग्र मानव-जीवन का सामान्य अध्ययन है, जबकि राजनीतिशास्त्र इसी मानवजीवन के केवल एक पक्ष (राजनीतिक पक्ष) का विशेष अध्ययन है।
- समाजशास्त्र संगठित और असंगठित सभी प्रकार के समाजों तथा समुदायों का अध्ययन करता है, जबकि राजनीतिशास्त्र केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से संगठित समाजों व समुदायों का अध्ययन करता है।
-समाजशास्त्र सामाजिक नियंत्रण के समस्त साधनों का अध्ययन करता है, जैसे- प्रथा, रूढ़ियाँ, आचार, परंपरा, कानून आदि, जबकि राजनीतिशास्त्र में नियंत्रण के केवल उन्हीं साधनों का अध्ययन किया जाता है कि जिन्हें राज्य ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी हो।
निष्कर्ष :
‘कल्याणकारी राज्य के कार्यों का सामाजिक जीवन पर प्रभाव' - इस समस्या का अध्ययन राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र संयुक्त रूप से कर सकते हैं और इस मामले में अर्थशास्त्र भी भागीदार बन सकता है क्योंकि राज्य के कार्यो में आर्थिक नियोजन आदि भी अवश्य ही होगा। उसी प्रकार परिवार नियोजन की समस्या भी एक ऐसी सामान्य समस्या है, जिसका अध्ययन अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान तथा राजनीतिशास्त्र सभी विज्ञान सम्मिलित रूप से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा से संबंधित समस्या, श्रमकल्याण से संबंधित समस्या, औद्योगिक झगड़ों से संबंधित समस्या, ग्रामीण पुनः निर्माण से संबंधित समस्या, युवा-वर्ग में व्याप्त असंतोष आदि ऐसी समस्याएँ हैं जिनका वास्तविक हल तभी संभव है जब विभिन्न सामाजिक विज्ञान इन समस्याओं का गहन अध्ययन करें। अतः स्पष्ट है कि दृष्टिकोण और अध्ययन-पद्धति भिन्न होते हुए भी सभी सामाजिक विज्ञान एक-दूसरे के पूरक है और इसी सहयोग के आधार पर उनका विकास संभव है ।
‘कल्याणकारी राज्य के कार्यों का सामाजिक जीवन पर प्रभाव' - इस समस्या का अध्ययन राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र संयुक्त रूप से कर सकते हैं और इस मामले में अर्थशास्त्र भी भागीदार बन सकता है क्योंकि राज्य के कार्यो में आर्थिक नियोजन आदि भी अवश्य ही होगा। उसी प्रकार परिवार नियोजन की समस्या भी एक ऐसी सामान्य समस्या है, जिसका अध्ययन अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान तथा राजनीतिशास्त्र सभी विज्ञान सम्मिलित रूप से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा से संबंधित समस्या, श्रमकल्याण से संबंधित समस्या, औद्योगिक झगड़ों से संबंधित समस्या, ग्रामीण पुनः निर्माण से संबंधित समस्या, युवा-वर्ग में व्याप्त असंतोष आदि ऐसी समस्याएँ हैं जिनका वास्तविक हल तभी संभव है जब विभिन्न सामाजिक विज्ञान इन समस्याओं का गहन अध्ययन करें। अतः स्पष्ट है कि दृष्टिकोण और अध्ययन-पद्धति भिन्न होते हुए भी सभी सामाजिक विज्ञान एक-दूसरे के पूरक है और इसी सहयोग के आधार पर उनका विकास संभव है ।
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