2.) समाजशास्त्र विज्ञान के रूप में

(क)विज्ञान,वैज्ञानिक पद्धति एवं समीक्षा

विज्ञान :-किसी  भी विषय को वैज्ञानिक पद्धति द्वारा तथ्यों को  एकत्रित किया जाय और उसी के आधर पर सिद्धानों का निर्माण किया जाए तो वह विषय विज्ञान के श्रेणी में आ जाता है ।

वैज्ञानिक पद्धति:-

विज्ञान विषय के अध्ययन का एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है ।

1.अवलोकन

अनुसंधानकर्ता द्वारा घटना या शोध विषय का निरीक्षण करना ।

2.सत्यापन तथा वर्गीकरण

अवलोकन द्वारा जो तथ्य एकत्रित किये जाते हैं उनकी सत्यता की जांच करना। समान विशेषता वाले शब्द का वर्गीकरण करना ।

3.सामान्यकरण

प्राप्त तथ्यो के सामान्य प्रवृति को स्पष्ट करना ।

4.भविष्यवाणी

वर्तमान निष्कर्षों के द्वारा भविष्य की घटनाओं के बारे में कुछ अनुमान लगाना ।

5.वैज्ञानिक प्रवृति

ज्ञान की किसी भी शाखा में ये विशेषताएं जितनी अधिक और स्पष्ट रूप से विद्यमान होती हैं उसे उतना ही स्पष्ट और यथार्थ विज्ञान कहा जाता है ।

समीक्षा

व्यवस्थित और क्रमबद्ध रूप से जहाँ कहीं भी तथ्यों का अध्ययन करके पक्षपातरहित निष्कर्ष प्रस्तुत किये जाते हैं वहां विज्ञान का निर्माण हो सकता है,चाहे ये तथ्य प्राकृतिक क्षेत्र से संबंधित हों अथवा सामाजिक क्षेत्र से ।

-समाज में कुछ तथ्य मूर्त होते हैं और कुछ अमूर्त्त ।दोनों प्रकार के तथ्यों के अध्ययन के लिये वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।।जैसे तुलनात्मक पद्धति तथा प्रकार्यात्मक पद्धति ।
सामाजिक तथ्यों को एकत्रित करने के लिये

सांख्यिकीय पद्धति,

-समजमिति,व्यक्तिगत जीवन अध्ययन पद्धति,सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति तथा ऐतिहासिक पद्धति आदि का प्रयोग किया जाता है ।

समाजशास्त्र केवल वास्तविक घटनाओं की विवेचना करता है । समाजशास्त्र का
'आदर्श'अथवा 'दर्शन'से कोई संबंध नहीं है ।
यह केवल यथार्थ परिस्थितियों का ही वर्णन करता है ।'क्या होना चाहिये 'से इसका कोई संबंध नहीं है ।

-समाजशास्त्र का नियम सर्वव्यापी होते हैं ।विज्ञान का एक आधारभूत लक्षण उनके नियमों की सर्वव्यापकता है ।