जस्टिस कुरैसी की सच्चाई | और सादगी

जस्टिस अकील अब्दुल हमीद कुरैशी का जन्म 1960 में गुजरात के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था । उनके पिता हामिद कुरैशी एक वरिष्ठ अधिवक्ता और साबरमती आश्रम संरक्षण और स्मारक ट्रस्ट के ट्रस्टी थे और 1917 में गांधी द्वारा स्थापित साबरमती आश्रम में पैदा हुए और रहने वाले अंतिम लोगों में से एक थे। जब 2016 में उनकी मृत्यु हुई तो उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार गांधी सिद्धांतों के अनुरूप उनका संस्कार किया गया । 1980 में गणित और 1983 में कानून में स्नातक करने के बाद न्यायमूर्ति कुरेशी अपने पिता के नक्शे कदम पर चले ।


हाई कोर्ट मैं अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस कुरैशी ने दो अहम फैसले लिए जो राज्य के तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार के लिए शर्मिंदगी भरे थे 2010 में उन्होंने एक निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया .


और सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले मैं सीबीआई को गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री और अब के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 2 दिन की हिरासत प्रदान की बाद में 2014 में ऐसा को विशेष सीबीआई अदालत ने मामले में बरी कर दिया था .


2011 में न्यायमूर्ति को वैसे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने गुजरात के तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल के पूर्व उच्च न्यायालय के न्यायधीश आर ए मेहता को और आज के लोकायुक्त के रूप में नियुक्त करने के फैसले को बरकरार रखा था इसका सीएम मोदी ने विरोध किया था .


गुजरात में परिचित जस्टिस कुरैशी की सत्य निष्ठा की पुष्टि करते हैं.

उन्होंने साबरमती आश्रम ट्रस्ट साबरमती हरिजन आश्रम ट्रस्ट और मानव साधना ट्रस्ट के परिसरों पर अतिक्रमण का आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था.


 त्रिपुरा के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उन्होंने 2020 में एक 14 वर्षीय लड़की को तस्करी के मामले में मामले को श्वेता संज्ञान में लिया .

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